Monday, 18 June 2012

बचपन में मोहल्ले के साथियों में से किसी एक के पास कहानी की कोई एक किताब हाथ लगती थी,  तो हम सब के हाथ उस किताब को छूने के लिए मचलने लगते थे. सब्र कम होने पर सर घुसाकर कहानी पढ़  कर ही दम लेते थे. चम्पक, नंदन, चंदामामा, फेंटम, चाचा चौधरी की कॉमिक्स. गर्मी की  छुट्टियों में  किताबो का आदान प्रदान ,गुड्डियों का खेल, रात को छू - छुऔवल ,लंगड़ी. जिनके ननिहाल, ददिहाल पास होते वो घुमने चले जातेऔर हम जैसे  कुछ लोग मन मसोस कर रह जाते. अतीत की यादे मीठी क्यों लगती हैं?