Saturday, 18 January 2014

BABAJI KA THULLU ?

बस में एक बच्चा पीछे बैठा था। उम्र कोई सात - आठ साल। चुप चाप। तभी एक लड़का जिसकी उम्र पंद्रह - सोलह के आस पास होगी, आया और उस छोटे बच्चे को घूरने लगा। फिर उन दोनों कि  बहस शुरू हुई। 
 
"अब्बे ! ये मेरी सीट है। " लड़के ने धौंस जमाते हुए कहा। 
"तो ?" बच्चे ने आत्मविश्वास के साथ कहा। 
"तो , उठ जा। मैं यहाँ बैठूंगा। "
"कही और बैठ जाइये , मैं  यहाँ से उठने वाला नहीं हूँ । "
"चुप चाप उठ जा वर्ना , मैं तेरा बैग उठा के फेक दूंगा । समझा !"
"बैग को हाथ लगाया तो मातारानी आपको पाप देगी । मैं नहीं उठने वाला।  "
"तेरी तो !"
"बाबाजी का ठुल्लु , मैं नहीं उठने वाला!!!"
 
बच्चे के मुंह से यह सुनके लड़के की बोलती बंद हो गयी। सचमुच , उस बुद्धू बक्से को , जिसे हम इतना कोसते है , वो किसी की आवाज बन सकता है। 

Monday, 18 June 2012

बचपन में मोहल्ले के साथियों में से किसी एक के पास कहानी की कोई एक किताब हाथ लगती थी,  तो हम सब के हाथ उस किताब को छूने के लिए मचलने लगते थे. सब्र कम होने पर सर घुसाकर कहानी पढ़  कर ही दम लेते थे. चम्पक, नंदन, चंदामामा, फेंटम, चाचा चौधरी की कॉमिक्स. गर्मी की  छुट्टियों में  किताबो का आदान प्रदान ,गुड्डियों का खेल, रात को छू - छुऔवल ,लंगड़ी. जिनके ननिहाल, ददिहाल पास होते वो घुमने चले जातेऔर हम जैसे  कुछ लोग मन मसोस कर रह जाते. अतीत की यादे मीठी क्यों लगती हैं?